क्या दे सकते हो तुम,
उस इक क्षण का हिसाब,
जो हमारे मिलन के बाद,
हमारी याद में न
तड़पा हो,
जिसकी तपिश
हम तक न पहुँची हो
जिसने कल्पना के
हिंडोले में न झुलाया हो,
नहीं, तो फिर कौन सी
रेखा पार कर नहीं पाये हम
शायद शर्म, समाज, की
बनी अनदेखी मज़बूत लक्ष्मण रेखाएँ