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05.03.2012
 
वो घर
शबनम शर्मा

मदन जी का भरा-पूरा परिवार। २ बेटे २ बेटियाँ। बेटियों की शादी उन्होंने कर दी थी। बेटों को उच्च शिक्षा दिलवाई व अच्छी नौकरियाँ भी मिल गईं। अपनी नौकरी में मदन जी ने २०० गज ज़मीन लेकर एक छोटा सा मकान बनाया। बड़े लड़के की शादी की बात चल रही थी, ऊपर की मंजिल बना दी। शादी के बाद बहू-बेटा अपने घर में चले गये। नीचे माँ-बाप और छोटा भाई। तीन बरस बाद छोटे की शादी हुई। बहू आई। २-३ महीने तो उसने माँ-बाप के साथ काट लिये फिर एक दिन दबी आवाज में कह ही डाला, ये घर हमें छोटा पडता है। मदन जी ने जैसे-तैसे अपने लिए तीसरी मंजिल पर एक कमरा, बाथरुम बनवाया। बहू के चेहरे पर रौनक आ गई।

 

पिछले माह मुझे मदन जी के पास जाने का मौका मिला। तीसरी मंजिल पर चढ़कर गई। कमरे में मात्र डबलबैड एक तरफ टेबल पर किचन की व्यवस्था देखकर हैरान सी हो गई मैं। सोचने लगी सब कुछ देने वालों को क्या इसी तरह सिमटना होता है। वो घर जिसे उन्होंने जी-जान तोड़कर बनाया, वो अब उनके लिए इतना पराया।


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