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इक चिड़िया,
अचानक बैठ गई
घर की मुंडेर पर,
बतियाने लगी,
पता है मुझे
सम्पूर्ण विश्व जानता है,
मैं हँस दी,
उसने फिर से अपना
वाक्य दोहराया,
मुझे अपने परिचय से
अवगत कराया,
मैं आम चिड़िया नहीं,
मैं सदियों
की उम्र संभाले हूँ
कई
तख्तो-ताज
देखे हैं मैंने,
देखने आई हूँ
अपने उस भारत को
जिसमें मुझे सोने
की चिड़िया कहा
जाता था,
आज भी सम्पन्न हैं हम
जरुरत है ईमानदारी,
कर्मनिष्ठा की,
कि मुझे फिर से
कहें "वो देखो वो चिड़िया, सोने की
चिड़िया"
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