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05.03.2012
 
विधवा
शबनम शर्मा

उसका सामना होते ही
पारदर्शी सी मेरी नज़रें
महसूस करती उसकी
दर्दनाक व्यथा,
ओढ़ी गई
बनावटी मुस्कुराहट की
बदरंग चुनरी,
किसी अनजान उम्मीद को
ढूँढती बेजान, स्थिर आँखें,
सम्पूर्ण डरा हुआ अस्तित्व,
फिर भी अपने रिश्ते चुपचाप
निभाती, ढोती बोझ हर
ज़िम्मेदारी का, लड़खड़ाते कदमों से
रखती बच्चों के सिर पर
दोनो हाथ एक मातृत्व व
दूसरा पितृत्व से भरा,
व सदैव थकी माँदी सी
नज़र अती, लगता कैसे डग भरती
उसकी ज़िन्दगी बोझ तले दबी
सफेद चादर के नीचे।


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