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ISSN 2292-9754

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10.11.2016


विछोह-१

 बहुत कठिन था वो पल,
जब हम घर से निकले,
फ़ैसला ले लिया था
कि बस अब और नहीं सहेंगे।
नहीं उठा पा रहे थे
ग़म का बोझ,
पूरी नहीं हो रही थी
रातों की नींद।
पर काट रहे थे वक़्त
उस नन्हीं जान के साथ
जो सुबह-शाम तोतली बातों
से रिझाता था हमें।
दिखता था उसमें हमें
अपने बेटे का अ्क़्स,
भुला देता था सारा दुःख
उसका इक निःस्वार्थ चुम्बन।
टूट गये, बिखर गये हम,
जब आती बार उसने
कहा, "मैं भी जाऊँगा
आपके साथ।"
उदासी, रुदन, शून्यता थी
उसके चेहरे पर,
पर माफ़ करना, हम बहुत
मजबूर हो चुके थे
ज़ुल्म सहते-सहते
आँसू पीते-पीते
टूटते-टूटते।


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