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02.27.2014


विछोह

चार दिन बेटे के पास
आए माँ-बाप
फिर से गिनने लगते
पल, घड़ी, घंटे
और चल देते उस
गाँव की ओर
जहाँ उनका अपना
कोई भी नहीं,
समेटते अरमान,
कुछ प्यार, कुछ नफ़रत
का सामान,
और सोचते
इन सोने की जंज़ीरों
से अच्छा है उनका गाँव
जहाँ की मिट्टी भी
उनका हाल पूछती है,
गाँव के सारे बच्चे
खेलने जाते वक्त
पूछना नहीं भूलते
दादी कुछ लाना तो नहीं
दुकान से,
परसू की बहू, आकर
सिर में तेल भी लगा जाती है
और मंगू का बेटा हुक्का भी
भर जाता है।
शायद उन्हें नशा है इस माहौल का
इसीलिये वो कुछ दिन रुक कर
वापस जाना चाहते हैं
अपने गाँव, जहाँ मिलता है उन्हें
एक नहीं अनेक बेटा-बहू का प्यार।


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