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ISSN 2292-9754

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01.27.2016


वह युवक

हम पिछले सप्ताह ट्रेन में सफ़र कर रहे थे, हमें नीचे की 2 सीटें मिली थी और सामने वाली में एक छोटा सा परिवार बैठा था। पति-पत्नी और नन्ही सी बालिका। देहरादून से गया तक वो भी हमारे हमसफ़र थे। बच्ची 2-2½ साल की थी। कभी अपनी वाली खिड़की में तो कभी मेरे वाली। जिस तरफ़ भी प्लेटफ़ार्म आता वो उसी तरफ़ आ जाती और खिड़की से झाँक-झाँक कर छोटी-छोटी चीज़ों की माँग करती। उसके पापा ने एक बार भी उसकी इच्छा को नहीं नकारा। वह भरसक प्रयत्न कर उसे हर चीज़ लाकर दे रहे थे। उसे गोदी में बिठा खिला-पिला रहे थे। जहाँ गाड़ी कुछ लम्बे समय के लिये रुकी, वो उसे घुमा भी लाये। इसके अलावा बाक़ी सारे काम अपने, पत्नी के व बच्ची के वह ख़ुशी-ख़ुशी कर रहे थे। मुझे उन्हें देखकर कई बार काफ़ी अचम्भा भी हुआ। भारत में पैतृक व पुरुषप्रधान समाज में ऐसा सुलझा इन्सान देखकर हैरानी होनी कोई बड़ी बात न थी। रात का खाना हमने इक्ट्ठा आर्डर किया और साथ में ही खाया। उसने सबकी प्लेटें फटाफट समेटी और बाहर फेंक आए। मुझसे रहा न गया। पूछ ही बैठी, "बेटा, इतनी क्या जल्दी थी हम खुद कर लेते।"

वह बोला, "नहीं आप भी मेरे माता-पिता के समान हैं इसमें क्या फर्क पड़ता है। दो अपनी और दो आपकी। दुआ ही तो मिलेगी।"

"ये तो है," मैंने कहा।

"पर आजकल ऐसे प्यारे बच्चे कहाँ?"

उसके चेहरे के भाव बदल से गये।

मैंने कहा, "मैं कल शाम से तुम्हें देख रही हूँ, तुम लगातार काम किये जा रहे हो, थके नहीं।"

उसने जवाब दिया, "आँटी, जब मैं 6 साल का था मेरी माँ मर गई, मेरा भाई 3 साल का था। लोगों ने पापा को दूसरी शादी करने को कहा। उन्होंने की नहीं। वह घर का सारा काम जैसे-तैसे करते और ड्यूटी पर भी जाते। मैं भी उनकी मदद करता। करते-करते आज ये वक़्त आ गया और आँटी बिन माँ के बच्चे ख़ुद ही सीख जाते हैं सारी ज़िम्मेदारियाँ निभाना।" कहते-कहते उसकी आँखें भर आईं और हम सब शांत से हो गये।


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