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तपती धरती पर
बरखा की पहली बौछार,
मदमस्त धरती का
बावलापन और कस्तूरी
की सी महकार,
मनमयूर नाचने लगा,
हजारों गीत बाँचने लगा,
कुछ ऐसा महसूस हुआ
कि शब्द कम पड़ गये
बयान करने को
कभी पिया की याद,
कभी सुनहरे सपने,
तो कभी गेहूँ की
बालियों में नाचने लगा,
बरखा की बूँदें
आग सी तपती धरती
को कितना सुकून देती
व साथ ही
सिखा जाती मानवता को
ये सबक कि
ठंडे, स्वर, मधुरवाणी
में लिपटे, बड़े से बड़े
बवाल को भी
बर्फ की सिल्ली में
परिवर्तित कर सकते हैं
विश्व को शांति स्तूप
सा बना सकते हैं।
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