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05.03.2012
 
स्पर्श
शबनम शर्मा

तुम्हारे प्यार का अहसास
नस-नस में आग के
अंगारों की तरह दहकता
तड़पता हृदय तुम्हारे
साiन्नध्य व स्पर्श को,
पीछे कर लिए मैंने ज़िन्दगी के
बढ़े हुए हाथ, उन्हें ख़ुशी देने हेतू
जो आज मेरे होने का दावा करते,
प्रिय, इक बार स्पर्श करो
मेरी वेदना, मैं मरुस्थल नहीं,
बफ| से घिरा पहाड़ बन गया हूँ
जो जीवन भर आँसू बहाएगा
जब भी महसूस करेगा
तुम्हारे गर्म आँसुओं संग
बहा मेरे लिए अथाह प्यार।


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