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ISSN 2292-9754

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01.27.2016


सोच

रोहन मेरे पड़ोस में रहता है। मैं भी इस स्थान पर कुछ दिनों पहले ही आई हूँ। वह छोटा सा बालक मात्र 10-11 बरस का है। अकसर मुझे देखते ही मुस्कुरा देता। मुझे भी उसे देखकर अच्छा लगता। एक दिन साथ की पड़ोसन ने बताया कि ये बालक मात्र 5 बरस का था जब इसकी माँ चल बसी। अब यह सौतेली माँ के पास है, उसके भी 2 बच्चे और हैं। माँ-बाप दोनों इससे अच्छा व्यवहार नहीं करते। फिर भी यह हमेशा मुस्कुराता इनका सारा काम करता रहता है।

एक दिन ज़ोरों की बारिश हो रही थी। मैं गलियारे में बैठी बारिश का मज़ा ले रही थी कि रोहन भी हमारे घर आ कर मेरे पीछे खड़ा हो गया। पानी से भीगा वह और भी सिकुड़ा सा लग रहा था। मुझे चाय पीने का बहाना मिल गया। मैं उसे अन्दर ले गई। तौलिये से उसका सिर पोंछा, उसे कुर्सी पर बिठाया और चाय बनाने लगी। इसी बीच मैंने पढ़ाई के बारे में उससे कुछ बातें पूछनी शुरू कीं। गज़ब के जवाब थे उसके। मेरा मन प्रसन्न हो गया। मैंने उसे शाबाशी दी और चाय बिस्कुट खाने का आग्रह किया। जैसे ही उसने चाय का कप उठाया, उसकी बाजू पर नीला गहरा निशान मुझे पसीज गया।

"ये क्या हुआ?"

वो चुप शान्त बैठा रहा। मैंने फिर पूछा, उसने जवाब दिया, "कल रात माँ की मदद कर रहा था, ठीक से काम न कर पाया, 2 रोटी मुझसे जल गईं। माँ ने चिमटा मार दिया। बस ये ज़रा सी लग गई।"

मेरे मुँह से चीख निकल गई, "ज़रा सी, ये ज़रा सी है। तेरे पापा ने कुछ नहीं कहा?"

"वो क्या कहते, वो तो मुझे ही डाँटते। पर आँटी, एक बात बताऊँ, ये कोई बड़ी बात नहीं है। अगर आज मेरी माँ ज़िन्दा होती तो मैं बिगड़ जाता। ये दोनों सख़्त हैं तो मैं अपनी कक्षा में प्रथम आता हूँ और कभी एक बड़ा अफ़सर बन ही जाऊँगा। फिर देखना................" कह कर वो तेज़ी से भाग गया और मैं उसकी बड़ी अनोखी सोच पर हाथ मलती रह गई।


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