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समय-समय पर
हर दर्द को
शब्दों में उकेरती
धुँध, बादल, काले स्याह
पहाड़ का दर्द समझती
राजा से रंक
इक सवाल कई अंक
लिखती मेरी कविता
घिनौनी राजनीति,
चापलूसी के अर्धनग्न
शब्दों से परहेज़ करती,
शायद इसीलिए
चंद लोगों की बपौती
नहीं बनती मेरी कविता।
सान्निध्य
मुझे नहीं कहना
अब कुछ भी तुम्हें
खत भी नहीं लिखना
शब्दों का बोझ
अब मेरा प्यार सह
नहीं पा रहा,
वह चाहता है तुम्हारा
स्पर्श,
अहसास!
बरबस बरस जाते हैं
नयन,
समझ नहीं आता है इनका
क्या रिश्ता है तुमसे
न माँगते शब्द न
सान्निध्य हो जाते।
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