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ISSN 2292-9754

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12.18.2014


शान

अंजू अच्छे खासे नामी खानदान की बहू है। वह अपने घर में सबसे बड़ी है, उसकी शादी में उसके माँ-बाप कुछ ख़ास न दे पाए जबकि दोनों देवरानियाँ अच्छा ख़ासा दहेज़ लेकर इस घर में आईं। अंजू हीन भावना से ग्रस्त हो गई। वैसे भी स्वभाव से वह कंजूस प्रवृति की महिला है। पति के पास धन की कोई कमी नहीं है। वह ज़रा-ज़रा सी बात के लिये पति से धन बटोरती। सारा साल छोटी-छोटी चीज़ों के लिये तरसती और पैसे जमा करती। बच्चों की छुट्टियाँ आतीं तो बिताने अपने मायके चली जाती। आती बार उसके पास ढेरों सामान होता। कभी-कभी तो भाई गाड़ी में छोड़ने आता। वह मायके का बखान करते न थकती। मेरी माँ ने ये किया वो दिया।

एक दिन मैं उससे पूछ ही बैठी, "अंजू, शादी पर तो इतना कुछ भी न था, अब तो तुम्हारे पिताजी भी रिटायर है, फिर माँ जी इतना कैसे कर पाती हैं।"

उसने कहा, "दीदी, सच कहूँ वो नहीं कर पातीं, पर यहाँ वीनू और रेणू की हालत देखी है मायके ने घर भर दिया है इसलिये मैं अपने पैसों से ये सब खरीद कर शान तो बनाती ही हूँ और मीनू के पापा पर रौब भी रखती हूँ।"

मैंने सिर हिला दिया परन्तु इक सोच मुझे कौंधती रही।


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