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सामने
वाले घर में राहुल की दादी की मृत्यु हो गई थी। राहुल की उम्र ५ वर्ष की है,
नन्हा बालक हैरान सा सब कुछ देख रहा था। उसके पापा ने फोन उठाकर ढेरों फोन
कर दिये। पापा बड़े व्यस्त नज़र आए। कुछ ही समय में घर लोगों से भर गया। वह
सब कुछ एक कोने में खड़ा देखता रहा। दादी का दाह संस्कार होने के बाद
नाश्ते-पानी के बाद सब उसके पापा को सांत्वना देने लगे। वो अपनी मासियों,
मामों,
ताई-चाची,
बुआ सबसे मिलकर बतियाते रहे। ८-१० दिन तक कुछ मेहमान आए कुछ गये। तेहरवीं
पर सब चले गये। राहुल के पापा आज उसके कमरे में आए। उन्हें राहुल का चेहरा
बड़ा उतरा हुआ लगा। इतने दिनों से किसी ने उसकी सुध नहीं ली थी। नन्हा बालक
पापा की गोद में बैठ गया।
“पापा
अब दादी कब आएगी।”
पापा ने कहा दादी दूर गई है बहुत दिनों में आएगी। फिर राहुल ने पूछा,
“पापा
जो हमारे घर दादी को देख-देखकर जोर-जोर से रो रहे थे और आपको चुप करा रहे
थे,
आप
उन्हें मौसी,
मामा,
चाची,
ताई,
बुआ कह रहे थे,
ये
कौन-कौन होते हैं।”
राहुल के पापा ने उसे सब रिश्तों का मतलब समझाया तो राहुल,
पापा के गाल पर गाल सटाकर बोला,
“पापा
जब मैं मरूँगा तो कोई नहीं रोएगा मेरा तो कोई बहन-भाई भी नहीं है।”
उसकी ये बात सुनकर राहुल के पापा ने उसे जोर से छाती से चिपटा लिया और कहा,
“नहीं
बेटा,
नहीं ऐसा नहीं कहते।”
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