अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
05.03.2012
 
राखी
शबनम शर्मा

मिस्टर मित्तल के यहाँ ब्याही थी मनोहर ने अपनी बहन। बहन नहीं बेटी ही समझते थे वो उसे। उसे पढ़ाया-लिखाया। अपने से अच्छी जगह शादी की। राखी का त्यौहार आया। मनोहर ने सोचा इस बहाने बहन को देख भी आऊँगा और राखी भी बंधवा आता हूँ। वो सुबह ४:०० बजे की बस से लुधियाना चले गये। ७:३० बजे वो अपनी प्यारी बहन के घर पहुँच गये। दरवाजे पर दस्तक दी तो अभी सारा घर सोया पड़ा था। भैय्या, आप इतनी सुबह-सुबह, आइए अन्दर आइए। भाई का आधा उत्साह पानी में पड़ गया। वो शानदार बैठक में गद्दीदार सोफे पर बैठ गया। कुछ ही देर में नौकर चाय लेकर आया। मनोहर अभी चाय पी ही रहे थे कि दनदनाती कार में से उतर कर एक सुन्दर युवक का प्रवेश हुआ। बहन दौड़ी-दौड़ी आई। भैय्या, आप तो कल आने वाले थे, कल से आपका इन्तजार कर रही हूँ। बैठो भईया मैं अभी आती हूँ।वो अन्दर गई व थाली में राखी सजाकर ले आई। उसने उसे पहले राखी बाँधी और बाद में मनोहर को। उस युवक ने ब्रीफकेस से निकालकर एक डिब्बा उसे पकड़ा दिया। मनोहर ने राखी बंधवाकर ५०१/- रूपये बहन को दिये। चहकती हुई बहन ने डिब्बा खोला, हीरों का सैट दिखाते मनोहर से बोली, “यह है न राखी का मजा, अरे भैय्या, ये बहुत बड़े ठेकेदार हैं, इस साल भी मित्तल साहिब पुल बनवाने का ठेका इन्हें ही देने वाले हैं। ये मुझे बहन मानते हैं। जीवन मूल्यों का स्तर सोचता मनोहर पागल सा घर की ओर चल दिया और नौकर ५०१/- रूपये वाली थाली उठाकर चला गया।



अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें