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05.03.2012
 
पुराना घर
शबनम शर्मा

हिलती चौखट,
टूटा फर्श,
काँपती दीवारें लिये
उदास
ताले को थमाकर
अपना अस्तित्व
खड़ा पुराना घर।

ठंडा हो चुका चुल्हा
काई सूख गई मटके की
जार जार हो गया बोहिया,
पटड़ियाँ तरस रही भोजन की परोस,
छाज टेड़ा हो झाँक रहा
दिखा रहा मुझे मंजे की हालत
जिसका वाण समय के
थपेड़ों से टूट गया,
जवाब दे रहा।

पर एक संदेश समेटे है पुराना घर
मैं तुम्हारा पुरखा हूँ,
तुम्हारी पहचान
तुम्हारी धरोहर।


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