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| 07.29.2007 |
| पसंद शबनम शर्मा |
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अम्मांजी की खाँसी की आवाज़ बता रही थी कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है। मेरे सामने वाले मकान में रहती हैं वो। सोचा उन्हें देख भी आऊँ और दो बातें भी कर लूँ। दोपहर का खाना निबटाकर मैं उनके घर चली गई। अम्मां की खुशी का ठिकाना न रहा। "बैठ बेटी, मैं तेरे लिये चाय लाती हूँ।" वो गरमा-गरम
अदरक वाली चाय लेकर आईं। बहू को आवाज़ लगाई व हम तीनों ने चाय पी। इसके बाद
वो उठीं और इमामदस्ता लेकर अपने लिये दवा कूटने लगीं। मैंने उनकी मदद के
लिये आग्रह किया, वो न मानीं। उसके बाद वो अपनी दवा लेकर, अपने कपड़े धोने
चल दीं। मैंने उनकी बहू से कहा, वो तपाक से बोली, "दीदी आपको क्या पता, इनको किसी का काम पसंद ही नहीं आता वा चार मिनट इधर-उधर हो जाएँ वो खुद करने बैठ जाती हैं। अब तो हमने कसम ही खा रखी है जो मर्जी करें, जैसे भी करें, खुद करें।" मैं उसके जवाब से स्तब्ध रह गई। पसंद की आड़ लेकर खुद का
पीछा छु्ड़ा लेना कहाँ की इन्सानियत है। |
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