| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 07.13.2008 |
|
शबनम शर्मा |
|
फरवरी का
महीना,
हल्की-हल्की ठंड और इस मौसम में वालिया हाऊस दुल्हन की तरह सजा हुआ। मुझे
भी इस पार्टी में शामिल होने का निमंत्रण आया। पार्टी का औचित्य समझ नहीं आ
रहा था। मिसेज वालिया बिना किसी कारणवश तो चवन्नी भी खर्चने वाली नहीं हैं
फिर इतना बड़ा आडम्बर किस खुशी में है। मैं सोचती चली जा रही थी कोई नन्हा
मेहमान भी नहीं आया,
फिर शादी भी नहीं हुई क्या कारण होगा?
सोचते-सोचते मैं प्रवेश द्वार तक आ गई थी कि सजी-धजी मिसेज वालिया की बहुओं
व उन्होंने स्वागत-द्वार पर हमारा स्वागत किया। अन्दर जाकर तो नज़ारा देखते
ही बन रहा था संगीत,
जाम,
नाच-गाना,
अच्छा खाना किसी भी चीज में कोई कसर न थी। लोग सब मजे ले रहे थे। अपनी
आदतानुसार मैं कारण जानने की जिज्ञासा न रोक पाई। मैं मिसेज वालिया के पास
पहुँची व उनसे पूछ ही बैठी,
“इस
खूबसूरत उत्सव का राज़ तो बताइए?”
वो
मुस्कुराते हुए बोलीं,
“भई,
मेरी बहू तो लक्ष्मी है लक्ष्मी,
देखो अपने पीहर से अपना हिस्सा लेकर आई है पूरे ४० लाख,
बुजुर्गों की जमीन थी,
सड़क में आ गई,
करोड़ों की बिकी,
आज
देखो लड़कियों का पूरा हक़ है हज़ार २ हज़ार की बात होती तो छोड़ना अच्छा था
अब इतनी बड़ी रकम में लड़की का हक़ तो बनता ही है।”
मैंने
वहाँ खड़े-खड़े अपनी नज़र पंडाल में दौड़ाई व मिसेज वालिया से पूछ ही बैठी,
“शालू
नज़र नहीं आ रही,
न
ही उसके बच्चे”
मिसेज
वालिया को मानो करंट लग गया हो। भड़कती हुई,
हाथ नचाती बोली, “तुम्हें याद नहीं ५ साल पहले उसने इस मकान ज़मीन से अपना हिस्सा माँगा था, मेरे लिये तो मर गई उसी दिन से। भाई भी उसे मुँह नहीं लगाते।” ये कहती हुई वो टिक्की के स्टाल से टिक्की लेकर खाने लगी, पर मुझे अपनी चाय की चुस्की कड़वी लगने लगी। |
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|