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07.29.2007
 
पराया धन
शबनम शर्मा

क्यूँ बदलना
चाहते हो तुम
मेरा अस्तित्व,
दुनिया में कदम रखते ही
सुनाते हो लोरी
पराये धन की,
फिर कराते हो
जी भर मजदूरी
मायके में ही,
ससुराल का ताना देकर,
कदम रखते ही
ससुराल में
नज़र आती
अनगिनत उम्मीदों की
गठरियाँ हर सदस्य के
सिर पर, जो झाँकती
सिर्फ बहू की ओर।
सिमटी सी गुजार
देती वो,
पूरी ज़िन्दगी दूसरों को
खुश करने हेतू,
पर क्यों भूल जाती
कि वो भी इक इन्सान है
दूसरों की तरह
जिसे पनपने ही नहीं
दिया जाता खुली हवा,
खुले आकाश में कभी।


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