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मेरे पड़ोस
से सारा दिन टी.वी. की आवाज़ें आतीं। कभी बच्चे भी इन आवाज़ों के साथ अपनी
आवाज़ें शामिल कर लेते तो नज़ारा व माहौल देखते ही बनता। परसों से कोई आवाज़
नहीं,
दरवाज़े भी बंद,
पर
कभी-कभी बच्चों की सिसकियाँ साफ सुनाई दे रही थी। मेरे सब्र का बाँध टूट सा
गया। मैंने आवाज़ लगाकर बच्चों की माँ से इस माहौल का कारण पूछा। वो बोली,
“पेपर
आ रहे हैं,
इन्हें पढ़ा रही हूँ,
ये
देखो टीचर्स ने इतना-इतना सिलेबस दे दिया है,
मैंने परसों से जमकर पिटाई की है इन दोनों की,
जी
करता है जान निकाल दूँ,
पढ़ने बिठाऊँ तो बैठती ही नहीं,
एक
बार लिखने के बाद दूसरी बार लिखना इन्हें पसंद ही नहीं।”
अध्यापन से जुड़े होने के कारण मैंने अपने विचार कहे,
“देखो,
सारा साल तो तुम इन्हें टी.वी. दिखाती रही,
खुद सारा दिन सीरियल देखती रही,
आज
सोचती हो सारे साल की पढ़ाई बच्चा एक दिन में कर ले,
ये
सँभव है क्या?
तुम ही बताओ ३० दिन का खाना एक दिन में खाया जा सकता है,
नहीं न,
इसलिये इन्हें मत मारो,
जितना पढ़ा है,
आता है,
करवा दो।”
उसे मेरी बात अच्छी नहीं लगी। दरवाज़ा बन्द कर लिया बुदबुदाते हुए कि घर में
रहकर स्त्रियाँ टी.वी. भी न देखें ये कैसे हो सकता है,
पढ़ाई तो इन्हें करनी है,
करें।
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