अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
05.03.2012
 
पढ़ाई
शबनम शर्मा

आज अभिभावकों को बुलाया गया था। मेरे पास करीब सभी बच्चों के माता-पिता आए। मैंने सबके रिर्पोट कार्ड दे दिये। बच्चों के बारे में बातचीत की। सबसे बाद नन्हीं बच्ची स्तुति के माता-पिता आए। स्तुति आज सुबह से बहुत खुशी थी। मुझे उसने आते ही बताया कि आज उसके मम्मी-पापा आएँगे। मैंने बड़े प्यार से कारण पूछा, तो उसने बताया कि वो अपने किसी रिश्तेदार के यहाँ रहती है। मम्मी-पापा ने उसे पढ़ाई के लिए यहाँ छोड़ा है। माता-पिता से बातचीत के दौरान पता चला कि दोनों एक ही स्कूल में सरकारी अध्यापक हैं तो दिल को और ठेस लगी। मुझसे रुका न गया। पूछ ही बैठी, "जब आप दोनों सरकारी नौकरी में अध्यापक के पद पर कार्यरत हैं और आपका स्कूल भी +२ तक है, तो इस बच्चे को, इस नन्हीं सी उम्र में अपने से दूर करने का क्या औचित्य है।" वो तपाक से बोले, "मैडम, इस स्कूल में पढ़ेगी, तो कुछ बन जायेगी, सरकारी स्कूलों में पढ़ाई होती ही कहाँ हैं, वहाँ पढ़ाता ही कौन है।" मैं स्तब्ध थी उनके जवाब पर कि सरकारी स्कूलों के ये अध्यापक हमसे चार गुणा वेतन पाते हुए भी क्या ये नहीं सोचते कि सरकार किसकी है, उनकी आत्मा क्या उन्हें इस जवाब के लिए धिक्कारती नहीं।



अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें