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07.29.2007
 
नववर्ष
शबनम शर्मा

नववर्ष, हथेलियाँ
ज़मीन पर टिकाये
सिर्फ सीटी बजने
की इन्तज़ार में
पलों, दिनों, सप्ताहों,
महीनों के साथ
बाधा दौड़ में
कुलाँचे भरने को
तैयार
भूल गये, धूमिल
हो गये वो पल,
रेल हादसे, तूफान
भूकम्प के झटके
व अनेकों विपदा"
इक सैलाब भींचे
मुट्ठियाँ, आँखें मूँद कर
इसमें डूबने को आतुर
कहते हुए "नववर्ष मुबारक हो।"
काश कि सबकी दुआ
कबूल हो, जी भर के
खुशियाँ आएँ, तरक्की हो,
मानवता की हर राह पर,
खुशहाल हो सम्पूर्णविश्व
व इक पक्की सी रारहद की
दीवार बन जाए विश्व व
विपदाओं के बीच, कि इक दूसरे
को ये कभी छू न सकें।


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