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03.16.2014


नन्हें फरिश्ते

तुम सुबह-शाम
वक्त लगते ही आते
सहलाते मेरे नासूर ज़ख्म,
भर लेते मुझे अपनी
बलिष्ठ बाहों में चुपचाप,
व समझा जाते
डूबा जाते मुझे उसी
सागर में, जिसमें से
कभी निकल नहीं पाऊँगी
कर्ज़, तुम भी चढ़ा जाते
प्यार का मुझ पर, ओ
नन्हें फरिश्ते, व कर जाते
मुझे कितना बौना,
समेटकर अपनी नन्हीं, बलिष्ठ
बाँहों में, लगाकर हृदय से।
लगता मर्द, मर्द होता है।


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