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ISSN 2292-9754

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12.18.2014


मूल्यांकन

अस्पताल के स्पैशल वार्ड में दोनों स्त्रियों के बिस्तर थे। उम्र भी करीब-करीब एक सी ही थी। दोनों ज़िन्दगी के 6 दशक पार कर चुकी थीं, बुढ़ापा तो अपने आप में एक बीमारी है फिर ऊपर से अकेलापन, चिन्ताएँ सब घेरे रखती हैं। मिसेज़ वालिया के दो बेटे हैं एक मुँबई में इंजीनियर है तो दूसरा कनेडा में एक अच्छी नौकरी में है। उसे भारत आए 5-6 बरस बीत गये हैं। हाँ, फोन पर बात ज़रूर हो जाती है। मुँबई वाले बेटे को कंपनी छुट्टी नहीं देती, अभी तक वो भी कभी ही आकर घर की खोज खबर लेता है। दूसरी वृद्धा मीना इसी शहर की एक महिला हैं किसी पाठशाला से अध्यापिका रिटायर हुई हैं।

पिछले हफ्ते वालिया साहब ने अपने दोनों बेटों को माँ की तबीयत के बारे में बता दिया था। दोनों ने माँ को फोन किये, हाल-चाल पूछा। आज वो देख रही थी सामने वाली मीना का बेटा तीनों वक्त गरम खाना, चाय लेकर आता, माँ को मनुहार करके पिलाता, छोटा पोता भी दादी को देखने आता, दादी से लिपटकर प्यार करता, अपने नन्हें-नन्हें हाथों से उसका सिर दबाता, कभी बहु कभी बेटा उनकी टाँगे दबाते, पीठ दबाते, उनके सिर में तेल मालिश करते। मीना की आधी बीमारी अपने बच्चों को देखकर खत्म हो जाती, मिसेज़ वालिया अभी ये सब देख ही रही थी कि वालिया साहब एक रजिस्ट्री हाथ में लेकर आए। मिसेज वालिया ने लिफ़ाफ़ा खोला, एक छोटा सा खत था इसमें, "माँ अपना ध्यान रखना, मैं चैक भेज रहा हूँ पैसे भर लेना, अपने लिये नौकर, आया रख लेना व पैसे की चिन्ता मत करना।" मिसेज वालिया ने लिफ़ाफ़े में चैक डाल दिया व मीना को निहारने लगी जिसका बेटा उसके पाँव दबा रहा था और मुस्करा-मुस्करा कर बतिया रहा था।


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