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05.03.2012
 
मिसाल
शबनम शर्मा

माई रामरक्खी पिछले दो साल से बीमार थी। घर के सभी सदस्य उनकी सेवा में लगे रहते थे। अपने-अपने रिश्ते के अनुसार सभी उनकी सेवा करते थे परन्तु उनका सबसे छोटा पुत्र उनके साथ काफी जुड़ा था, वो घर के हर सुख-वैभव को माँ का आर्शीवाद मानता था। माँ की छोटी से छोटी बात का ध्यान रखता था।

पिछली बैसाखी को पूरे परिवार ने अमृतसर जाने का कार्यक्रम बनाया। सबने अपना-अपना सामान बाँध कर गाड़ी में रख दिया। अब सवाल माँ जी का आया। एक ही दिन की तो बात थी। माँ जी को उनकी आया व नर्स के सहारे छोड़ कर जाने का प्लान बन गया। सारा परिवार सुबह चार बजे उठ गया। नहा धोकर सब गाड़ी में बैठ गये। बहुएँ - बेटे, पोते-पोतियाँ। इतने में छोटी बहू माँ जी के पास उनकी चाय थर्मस में लेकर उन्हें देने गई। माँ जी को अब दिखता न था। चाय रखते हुए बहू ने कहा, माँ जी रात तक वापस आ जाएँगे, ये आपकी चाय, पराँठे, दवा।

बहू, मैं सारा दिन अकेली रहूँगी।

नहीं, आपके पास नर्स है आया है।

पर मेरा अपना कोई नहीं।

इतने में छोटा बेटा अपना बैग गाड़ी से उतार लाया व पास बैठकर बोला, ऐसा हो सकता है माँ, मैं हूँ न तेरे साथ। सब स्तब्ध रह गये। ये इक मिसाल थी मातृप्रेम की।


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