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05.03.2012
 
मेरे बेटे
शबनम शर्मा

सामने वाले मकान में आँटी को चोट लग गई। मैं भी २ दिन बाद उनका हाल-चाल पूछने गई। अकसर रास्ते में, शादी-ब्याह या किसी भी दुख-सुख के अवसर में आँटी मुझे मिल जाती थी। उनकी सौम्यता से प्रभावित होकर मैं हमेशा उनके पाँव छूती। २-३ मिनट उनसे बतियाकर आगे बढ़ती। परन्तु उनके निजी जीवन से पूर्णतयः अनभिज्ञ थी। जैसे ही मैं उनके घर गई, वह मुझे देखकर खुश हो गईं, फिर बताने लगीं कि कैसे उनका पैर फिसल गया और फ्रैक्चर हो गया। थोड़ी देर में उन्होंने मेरे लिए चाय बनवाई। चाय लेते मैंने पूछा,

"आँटी आपकी देखभाल कौन कर रहा है?"

उन्होंने बताया, "ये मेरी बड़ी बेटी है, परसों ही आ गई थी। पलस्तर ४५ दिन का है, १५-१५ दिन तीनों बेटियाँ कटा जाएँगी।"

मैंने पूछा, "और आपका बेटा?" वह ठहाका मार कर हँस दी और बोली,

"अभी भी शंका है, अरे बिटिया, ये तीनों मेरे बेटे हैं, बेटियाँ तो कहने को हैं। और कौन बेटा अपनी माँ की इस तरह देखभाल करता है, मुझे तो सपने में भी बेटे का ख्याल नहीं आया। अब हम आजाद हैं बेटी, बेटा-बेटी का फर्क मिटाना हमसे ही शुरू होता है, सो मैंने तो अपना फ़र्ज पूरा किया।"

यह कहकर वो मेरी ओर देखकर गर्व से मुस्कराने लगीं।


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