जहाँ, ज़ुबाँ पर लगाम,
आँखों पर परदा,
भावनाओं पर अंकुश,
साँस लेने पर पाबंदियाँ,
हर समय हज़ारों पहरेदार,
हाथ ज़रूरतों को पूरा करते,
मशीनी मानव बनी मैं,
पराई सहर, पराई शाम,
हर दम काम था काम,
निचोड़ ली जाती सारी कमाई,
हसरतों का नाश,
पत्थरीली आँख
जहाँ आहुति देने के सिवा
कुछ नहीं,
वहीं तो है मेरा अपना
सिर्फ़ मेरा अपना घर।