अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
05.03.2012
 
मरुस्थल
शबनम शर्मा

नज़र आता है मुझे
कुछ शब्दों का
शब्दकोष से हमेशा
के लिए मिट जाना,

कुछ रिश्तों का समाज
से उठ जाना,
देखती हूँ अन्धकारमय
इक लम्बी काली रात
जब सुनती हूँ
कि आज हम अपने
ही हाथों से गला घोंट
रहे हैं अपनी ही
जन्मदायनी का।

सुनाई नहीं दे रही
उसकी गूँगी चीखें,
सूखे आँसू
जो हमें भसम कर देंगे
और डाल देंगे मरुस्थल
के उस हिस्से पर
जहाँ पानी की बूँद को
तरसते हम फ़ना हो
जायेंगे।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें