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ISSN 2292-9754

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10.11.2016


मैं कहाँ गलत थी?

सुबह अँधेरे मुँह उठती,
दबे पाँव सारा काम करती,
बनाती सबके लिये नाश्ता,
झाड़ती बिस्तर, साफ़
करती घर व बच्चों
को तैयार कर
चली जाती चंद सिक्के कमाने।
काम से आकर, जो भी बचा-खुचा
होता, खाती व समेटती
बिखरे खिलौने, बिखरा सामान
टेक लगाती चंद लम्हें गुज़ारती,
व फिर लग जाती काम में
कब शाम व रात हो जाती
पता ही न चलता।
छोटी-छोटी बातों के लिये,
बच्चे ताकते मेरे हाथ
जो बन पाता कर ही देती
कभी लिपटते कभी हँसाते
कभी लड़ते, कभी झगड़ते
फिर भी कभी खुश न कर पाई
मैं उस घर में सबको,
क्यूँकि मैं थी उसके पति की माँ,
कोई रिश्ता न था उसका मेरे संग
सिवाय उलाहनों, कटाक्षों के सिवा
सोचती हूँ कहाँ ग़लत थी मैं,
हाँ, मैं ग़लत थी, क्यूँकि मैं
उन्हें अपना मान रही थी
जो कि कभी अपने थे ही नहीं।


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