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02.27.2014


माँ

माँ, मैं महसूस कर सकती हूँ
तुम्हारी व्यथा,
क्यूँ तुम इतनी शिथिल पड़ गई
पापा के जाने के बाद,
तुम, तुम नहीं रह गई हो,
जानती हूँ तुम्हारी वाणी के
स्वर वो साथ ले गये हैं,
कपड़ों से निचोड़कर समस्त रंग
किसी अंधेर कोठरी में डाल आए हैं,
तुम ताकती हो कई बार शून्य में,
कहती हो, उनसे कि तुम्हें ये
सज़ा क्यूँ दी,
चहुँ ओर की रौनक
सुनसान सी लगती है तुम्हें
बेटे की कमाई के
सौ का नोट हज़ार सा
दिखाई देता,
कंपकंपाती हो, दो रुपये शगुन
देने पर भी, जो कभी मुट्ठी बंद में,
देती थी अनगिनत रूपये पापा की कमाई से,
मैं अब समझती हूँ
क्योंकि मैं भी इक माँ हूँ।


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