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05.03.2012
 
माँ
शबनम शर्मा

बरसों पहले एक ही
बात, लड़का नहीं बेचूँगी
दहेज नहीं लूँगी,
बहू नहीं बेटी लाऊँगी
वही किया।
पर खरी नहीं उतरी
इस कसौटी पर, क्योंकि
सब कुछ देने के बाद भी
हिम्मत नहीं थी बहू से
कुछ भी कहने की बेटी की तरह,
जवाब भी नहीं मिलता था सही
वो हर बात को चने के झाड़ पर
चढ़ा देती।
एक दिन कह ही बैठी,
कि तू बहू नहीं मेरी बेटी है
बरसों की मुराद,
तपाक से जवाब मिल
“ये आपका स्वप्न था मेरा नहीं
माँ-माँ होती है सास, सास।“
मैं बिखर गई कितनी किरचों में
कि मुझे अपना चेहरा ही
नज़र नहीं आया।


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