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05.03.2012
 
माँ
शबनम शर्मा

उनकी माँ के
जाते ही जमघट
सा लग गया घर में,
खड़ी हो गई कई अनदेखी
दीवारें, और सुन सकती
थी बतियाते अच्छाई
बुराई के कई पुराण,
देख सकती थी बंटवारे
की नज़रें, जोकि
बाँट रही थी उस
खिड़की की हवा भी
जहाँ बैठकर माँ घंटों
करती थी घर गृहस्थी
में पैबंद लगाने के
कई काम,
पर चूक नहीं पाई
मेरी नज़र उस कोने से,
जहाँ बैठी थी इस
घर की बेटी, चुपचाप,
जड़वत सी, ताकती
शून्य में अविरल
नयनों संग, जिसके
लिए अब यह दहलीज़
ऊँची हो गई थी
जिसे लाँघना इतना
आसान न था।



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