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आज ५:००
बजे झबुआ अपनी झोंपड़ी में लौटा,
तो
सामने वाले बंगले में उसे २ घंटे के काम का बुलावा आ गया। २०० रूपये मिलने
थे,
सोचा काम कर ही लिया जाये,
दीवाली आने वाली है बच्चों के लिए कुछ खरीदेगा। उसने हाथ मुँह धोया,
चाय पी और तसला उठाकर चल पड़ा। उसके पीछे उसकी २ वर्षीय नन्हीं बेटी सुमी
दौड़ पड़ी। काम घर के पास ही था। वह बंगले के सामने मिट्टी डाल रहा था। मैं
भी अपने घर से बाहर बैठी सब्जी काट रही थी। झबुआ जब मिट्टी का तसला भरता तो
नन्हीं को तसले की मिट्टी पर बिठा लेता वह नन्हें हाथों से तालियाँ बजाती,
उसके सिर पर बैठी खूब हँसती परन्तु जब झबुआ खाली तसले में उसे हिला-हिलाकर
ले जाता तो कसकर तसला पकड़कर गाने से गाती। मैं बाहर बैठी ये खेल २ घंटे तक
देखती रही और साथ ही सामने वाले मकान में खड़ी छोटी सी लड़की को जो बार-बार
आकर गेट की सलाखें पकड़कर खड़ी होती अपनी आया से कह रही थी,
पापा-मम्मी नहीं आए अभी तक और उदास सी पास रखी प्लास्टिक की लाल कुर्सी पर
बैठ जाती थी,
सहम जाती थी। अंधेरा छा चुका था झबुआ घर चला गया था पर वो नन्हीं अभी भी
सलाखों को पकड़े दूर तक देख रही थी।
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