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| 07.13.2008 |
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जवाब शबनम शर्मा |
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घर में कोई भी त्यौहार होता या कोई छोटा-मोटा उत्सव मीना अपनी बेटी को न्यौता देना कभी नहीं भूलती। उसके साथ जमाई बाबू भी आते तो घर में माहौल बदल जाता, सब उनके पीछे-पीछे घूमते, खाने-पीने, उठने-बैठने से लेकर सोने तक औपचारिकता रहती। मीना की बहू चुपचाप काम में लगी रहती। घर में दीवाली की तैयारियाँ चल रही थीं। मीना ने अपनी बेटी को फोन किया, फिर उसे कहा कि उसका भाई उसे लेने आएगा। आज दीवाली को २ दिन रह गये थे बेटी का कोई जवाब न आया। मीना ने फोन उठाया और बेटी से कहा, “बाजार में रौनक है, घर में भी तेरे बिना अच्छा नहीं लग रहा, तू जल्दी आ जा, हम सब बाजार चलेंगे, सामान लायेंगे।” उधर से बेटी ने जवाब दिया, “नहीं माँ, इस बार मैं नहीं आ सकती और अब कभी आऊँगी भी नहीं, हमारे घर से जाने पर मम्मी-पापा को घर खाली हो जाता है और आपके यहाँ भाभी को काम बढ़ जाता है। माँ बुरा मत मानना, अगर भाभी हर त्यौहार पर अपने मायके चली जाए, तो आपको कैसा लगेगा?”
बेटी का
जवाब सुनकर मीना सकते में आ गई और वास्तविकता से परिचित होते ही मुस्काने
लगी।
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