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07.01.2014


घर किसका?

मिन्नी की माँ पिछले कई वर्षों से बीमार चल रही थी अचानक ही एक दिन मिन्नी पर गाज टूट पड़ी। वह कॉलेज से घर आ रही थी कि मोबाइल बजा, उधर से उसके पिता की आवाज़ थी, "मिन्नी माँ नहीं रही, घर खाली करो, मैं २ घंटे में चंडीगढ़ से पहुँच रहा हूँ।" मिन्नी की सारी दुनिया उजड़ चुकी थी। वह इकलौती बेटी है, एक माँ ही उसे समझती थी, जो चली गई। रोती- बिलखती घर तक पहुँची। पिता लाश लेकर पहुँच गये थे। दुनिया के रसमों रिवाज़ भी कुछ दिन में निबट गये थे। उसने मम्मी के कमरे में ही अपना बिस्तर लगा लिया था। घर की सारी ज़िम्मेदारी उस पर आ गई थी। सारा काम करके कॉलेज जाती। आकर फिर बचा काम निबटाती। उसे माँ की पल-पल कमी खलती, उधर रिश्तेदारों ने पिता की दूसरी शादी की बात चला दी व साल बीतते उनकी शादी कर दी। मिन्नी ठगी सी रह गई। माँ के आते ही पिता की नज़रें भी बदल गई। धीरे-धीरे नई माँ ने सारे घर पर अपना कब्जा जमा लिया। कहीं वह सोती, कहीं बैठकर सजकर तो कहीं से उसे पूरे घर को देखना होता। मिन्नी कॉलेज से घर लौटी तो स्तब्ध रह गई। आज उसका कमरा उसकी बगैर अनुमति के उलट-पुलट था। उसका बिस्तर पीछे स्टोर में लगवा दिया गया था और माँ का सामान गठरियों में बाहर पड़ा था जिसमें माँ की तस्वीर का फ्रेम झाँक रहा था जिसका शीशा टूट गया था और फोटो फाड़ दी गई थी। मिन्नी बुत सी बनी सब देखकर बाहर आँगन में खड़ी थी कि अंदर से आवाज़ सुनाई दी, "ये बना न अब ढंग का बैडरूम, बड़े दिन से सोच रही थी परन्तु कर नहीं पा रही थी।"

"अरे, तुम्हारा घर है, मालकिन हो तुम, जब चाहे कर लेती, तुम्हें किसने रोका था?" पापा की आवाज़ थी।

"वो न तुम्हारी लाड़ली, इस कमरे को चिपककर रहती है।"

मिन्नी ने धीरे-धीरे भारी कदमों से अन्दर प्रवेश किया। ढूँढती-ढूँढती वह अपने बिस्तर तक पहुँच गई। उसे लगा वह घर भी माँ के साथ मर गया जिसमें हर चीज़ कभी उसके इशारों पर नाचती थी।


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