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05.03.2012
 
घर
शबनम शर्मा

रविन्दर अपने आँगन में बैठे अपने बड़े बंगले को निहार रहे थे। इतने में नौकर चाय लेकर आ गया। चाय की चुसकियाँ लेते-लेते उन्हें एकाएक अपने इकलौते बेटे का बचपन याद आ गया। आज वो अपनी जन्दगी के ६ दशक पार कर चुके हैं। बेटी अपने घर चली गई है। पत्नी बीमारी से परेशान दम तोड़ चुकी है। अब वो इस इतने बड़े घर में अपने नौकर के साथ अकेले हैं। न तो इसे छोड़ते बनता है, न बेचते, न रहते। उन्हें अच्छी तरह याद है कि उनकी पत्नी ने उनसे कई बार कहा था बच्चों की पढ़ाई का समय है इन पर ध्यान दो, परन्तु उन्होंने उसकी एक न सुनी थी। बच्चों को सामने वाले स्कूल में भेज दिया था। बेटा हिसाब में कमजोर था, कई बार ट्यूशन के लिये कहता, परन्तु उन दिनों वो अपना घर बनवा रहे थे। सारे खर्चों में कटौती की थी। उन्होंने अपने बेटे को सब कुछ होते हुए भी ट्यूशन का प्रबंध नहीं करके दिया था। जैसे-तैसे बेटा बड़ा हुआ व दूर चला गया। उसे इस गाँव से नफरत हो गई। उसके मन में ये बैठ गई कि वो कुछ बन सकता था पन्तु पिताजी ने उसे मौका नहीं दिया। उसने अपनी छोटी सी गृहस्थी बसा ली थी। पत्नी की बिमारी का ईलाज कराने के लिए भी वक्त न था, उन दिनों बाजार वाली दुकानें, मकान बन रहा था, वो भी चल बसी। आज वो महज अकेले रह गये हैं, अब क्या करें इस घर का, सोच माथे पर हाथ मारते हैं।



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