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ISSN 2292-9754

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02.06.2017


ग़रीब

आज बिलख रहा ग़रीब,
तड़प रहा ग़रीब,
रोटी ग़रीब की तो पहले
ही महँगी थी,
अब सोने की क्यों हो गई?
लम्बी-लम्बी कतारों में खड़ा
वो नब्बे वर्ष का बुज़ुर्ग,
जिसे सिर्फ अपने अंगूठे
पर मान था,
खिलाई थी उसने
कुटुंब को रोटियाँ,
आज उसकी रोटी क्यूँ उसका
नसीब हो गई,
रखे थे छन्नो ताई ने कुछ नेग
छिपाकर, लाड़ली के लिये,
आज उसकी झोली क्यों ग़रीब
हो गई,
लगानी चाही क़ीमत हीरों की,
कुँदन चाचा की चाँदी क्यों
लोहा हो गई।


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