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05.03.2012
 
फैसला
शबनम शर्मा

रचना एक फैक्टरी में काम करती है। सामने वाले मकान में उसने कमरा ले रखा है। सुबह ७ बजे से शाम ७ बजे तक कमरा बंद रहता है। उसके लौटने पर वो खुद बंद करके रखती है। लड़की अच्छी, होनहार, सुशील व सुन्दर है।

एक शादी में उससे मुलाकात हुई। इधर-उधर की बातें करने के बाद मैं पूछ बैठी,
      "रचना शादी कब कर रही हो?"
      उसने हँसकर कहा, "आँटी क्या जल्दी है, कभी अच्छा लड़का मिला तो कर लूँगी वरन् ऐसे ही क्या बुरी लगती हूँ।"
      "नहीं बेटा एक साथी तो चाहिए"
      उसने कहा, "शायद आप नहीं जानती, पिताजी बचपन में ही मुझे अकेला छोड़ गये, माँ ने दूसरी शादी कर ली, दादी ने रखा ४ साल पहले दादी भी मर गई। अब नौकरी में हूँ अपना गुजारा आसानी से कर लेती हूँ, १-२ जगह शादी की बातचीत चली, अकेली होने पर किसी को दया नहीं आई, सवाल इसके बाप की जायदाद में इसका भी तो हिस्सा है, वो माँग लो। सुनते ही मेरा तन-बदन जल गया। माँ के पास दूसरी शादी से अपने बच्चे हैं, वो उसी मकान में रहती है, उसने मुझे कभी नहीं बुलाया, तो मैं क्यों माँगू हिस्सा? जब भगवान ने मुझसे सब कुछ छीन लिया तो अब मैं इन पचड़ों में क्यूँ पड़ूँ, मैंने फैसला किया है कि मैं शादी नहीं करूँगी, अपनी तरह किसी अनाथ बच्चे को लाऊँगी व पालूँगी।"

 मुझे उसके दर्द ने झकझोर दिया। समाज कितना क्रूर है कैसे-कैसे फैसले लेने पर लड़की को मजबूर कर देता है।


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