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09.01.2014


दिखावा

वो बुत सी बनी मेरे सामने बैठी मुझे एकटक ताक रही थी। उसके तन के कपड़े, उसकी आँखें न कहकर भी सब कुछ बयान कर रहे थे।

"रीना," मेरी आवाज़ से वो चौंकी। "कैसी हो? कितने दिनों बाद आना हुआ?"

"आँटी, वो लोग भेजते ही नहीं, घर का सारा काम, बाबूजी की बीमारी, इनका ऑफिस सब मुझे ही करना है।" ये कहकर वह शून्य में ताकने लगी। मैं कुछ सोचने पर मजबूर हो गई, 2 साल पहले मैं रीना की शादी में गई थी। क्या शादी थी। बारातियों को चाँदी की प्लेट भेंट में दी गई। उन्हें शहर के सबसे मँहगे 5 सितारा होटल में ठहराया गया। खाना भी वहीं खिलाया गया। बैड, दहेज किसी में भी कमी नहीं की गई। 60-60 हज़ार की साड़ियाँ, ज़ेवर क्या नहीं दिया अपनी बेटी को। बाद में पता चला कि उन्होंने 50-55 लाख रूपया शादी में खर्च किया।

"रीना तुम मुझे ख़ुश नहीं लगती," ये कहकर मैंने उसका हाथ अपने हाथ में लिया।

उसका हाथ पकड़ते ही वह फूट पड़ी। बोली, "आँटी इतना दिखावा, न करके अगर मम्मी-पापा मेरे नाम कुछ कर देते तो अच्छा था। आज वो लोग हर दिन नई डिमांड रखते हैं। मुझे एक रुपया भी नहीं देते। सब बातों पर अंकुश है। मैं सुबह से शाम तक काम करती हूँ, सबको ख़ुश करने की भरपूर कोशिश करती हूँ। हर बात में ताने, बड़े घर की बेटी है। ऊपर से मेरे पापा ने 12 तक पढ़ाया ये सोचकर कि मेरी बेटी को पढ़कर कौन सी नौकरी करनी है, आँटी, हर बात के लिये मुझे सास का मुँह देखना पड़ता है और फिर वो चाहें तो 100-200 रुपये की बख्शीश दे दें वरन् उनका मुँह ताकती रहूँ। नौकरी कर नहीं सकती, पति घर से बाहर जाने नहीं देता, मम्मी-पापा को फोन कर नहीं सकती। आप मम्मी की हालत देखिए कैसी हो गई। आँटी, दिखावा न करके हमेशा अपने बच्चे के भविष्य के लिए सोचना चाहिए।"

ये कहकर वो बुरी तरह रोने लगी।


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