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07.19.2014


धोखा

कौन, किसे, कब
धोखा देता
कितना ग़लत,
कभी नहीं।
धोखा दे रही हूँ खुद को,
बनावटी मुस्कुराकर,
झूठे-सच्चे रिश्ते बनाकर
एक उम्मीदों का गुम्बद दिखाकर
इस बेचारे दिल को,
जो सिर्फ़ धड़क सकता है
देख नहीं,
क्यों, आखिर क्यों कर रही हूँ
मैं ऐसा? ग़र सच का आईना
दिखा दिया इसे, तो शायद ये
धड़कना भी बंद कर दे।


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