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इक अंधी दौड़ में
दौड़ता हुआ हर आदमी,
व्यक्तिगत स्वार्थों की
पूर्ति करता,
अपनी पीढ़ियों के लिए
जी तोड़ मेहनत करता आदमी
क्यों भूल जाता
कि वो भी देश के
भविष्य, वर्तमान का एक पत्थर है
फिर समझ नहीं पाती कि
क्यों नहीं बनाता वो इक मज़बूत दीवार
और नहीं जोड़ता उसमें अपने अस्तित्व
का पत्थर, जिससे कि विश्व देख सके
ऊँची, गगनचुम्बी, सौहार्द, भातृप्रेम,
मातृप्रेम, के विभिन्न मणिकों से
बनी अद्भुत दीवार।
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