अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
05.03.2012
 
दर्द
शबनम शर्मा

बनवारी लाल ५८ वर्ष की आयु में सेवानिवृत होकर घर आये। सोच कर खुशी से फूले नहीं समा रहे थे कि अब आराम से बच्चों के साथ रहेंगे। सारी उमर घर से दफ्तर, दफ्तर से घर का काम करते-करते ऊब से गये थे। उन्होंने अपना ये विचार अपनी पत्नीके साथ बाँटा। वो भी उनके साथ सहमत थी। रात का खाना खाकर दोनों बतियाने लगे। जब उनकी शादी हुई कितना बडा परिवार, दादा-दादी, दो बहनें स्कूल जाती हुई, दोनों छोटे भाई, माँ-बाप और विधवा ताई जी। धीरे-धीरे परिवार छँट गया और छोटे देवर की नौकरी व शादी के बाद वो अपने परिवार के साथ रहने लगे। इतनी जिम्मेदारियाँ निभाते-निभाते कब ज़िन्दगी की शाम आ गई पता ही नहीं चला। आज उन दिनों की यादें ही इस परिवार की नींव हैं।

इतने में छोटी बहू दूध का लोटा, दो गिलास लिए कमरे में आई। पीछे-पीछे बेटा भी। दूध डालते-डालते बहू बोली-

पिताजी! आपसे कुछ कहना था।

हाँ, हाँ, कहो बेटी।

पिताजी! काफी दिनों से सोच रहे थे आप रिटायर होने वाले हैं, अब आप घर पर ही रहेंगे। क्यूँ न हम या आप ऊपर वाले मकान में चले जाएँ। अब देखिए न, इनके मित्र, मेरी सहेलियाँ, बच्चों के संगी, साथी आते हैं। हमें कुछ अजीब सा लगता है। आप और माँ जी अपना खाना अलग बना लीजिये, कभी-कभार जरूरत हो तो आवाज़ लगा देना।

बनवारी लाल ने असहमति प्रकट की, पर बेटा बोला, पिताजी! इस उमर में आप लोगों का खाँसना, हर काम धीरे-धीरे करना, सबकी बातों में दखलअंदाजी करना मुझे तो बिल्कुल पसंद नहीं, रीना ठीक ही तो कह रही है। पिताजी आसमान से जमीन पर गिर पड़े। बोले, ठीक है बेटा, अब हमें तू समुद्र से एक्वेरियम में भेजना चाहता है। ठीक है, हम दोनों ही ऊपर चले जाएँगे। उनके इस फैसले का दर्द उनकी पत्नी समझ रही थी, जो पाँव के अँगूठे से ज़मीन कुरेद रही थी।



अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें