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05.03.2012
 
दान
शबनम शर्मा

बलविन्दर ने २० कम्बल खरीदे और अपने कमरे में रख लिए। वह उन कम्बलों को दान करना चाहती थी। हम दोनों बड़े लम्बे समय से एक-दूसरे के मित्र हैं। हर बात एक-दूसरे से बाँटते हैं। मैं बलविन्दर के स्वभाव से बड़ी अच्छी तरह परिचित हूँ। वह हर बात को बड़ी गहराई से सोचती है। हल्की ठंड पड़ने लगी। मैंने उससे कहा, "बलविन्दर ये कम्बल तूने किसको देने को रखे हैं, अब ये ढेर यहाँ पड़ा ही रहेगा या निबटाएगी भी।"

बड़े सहज भाव से बोली, "दीदी सोच रही हूँ रात को गाड़ी में कम्बल रखकर दे ही आऊँ, पर आजकल मेरे पति काफी व्यस्त चल रहे हैं।"

मैंने पूछा, "रात को ही क्यूँ, दिन में क्यूँ नहीं?"

वह बोली, "दीदी मेरी इच्छा है कि सड़कों पर जो लोग रात को उकड़ कर सोए होते हैं, मैं चुपचाप दबे पाँव उन पर ये कम्बल डाल आऊँ, जिससे उन्हें कभी पता ही न चले कि किसने दिया है, मैं नहीं चाहती कि कोई लेती बार अपनी आत्मा को नीचा देखे व मुझे दानवीर कर्ण। मैं चाहती हूँ ये काम इतना सहज हो कि किसी की नींद भी न टूटे व मेरा काम भी हो जाए।"

उसकी ये बात सुनकर मैं अवाक उसकी भावनाओं को सहलाती घर आ गई।


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