अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली

मुख पृष्ठ
03.16.2014


चिड़िया

इक चिड़िया सुबह-शाम
कू-कू कर कूकी
तुम्हारे दिल के आँगन
वाले उस प्यार के
पेड़ पर,
जिसके पत्ते कागज
के थे, ज़रा सी
आँच लगते ही जल गये
चिड़िया बैठी थी
झुलस गई, तुम बचा न पाये
और वो कूक सिमट गई
आकाश के विस्तृत
विस्तार में।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें