मैंने दादी के संदूक का ताला तोड़ा यकीन करो, ज़ेवर, नगदी छुई तक नहीं, सिर्फ़ चुरा ली इक चुनरी, लगी ओढ़ने, बर्फ सी ठंडी, शान्त, सौम्य कि उड़ कर फिर से बंद हो गई, ख़ुद-ब-ख़ुद उस संदूक में।