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| 08.07.2007 |
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छुट्टियाँ शबनम शर्मा |
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गरमी की छुट्टियाँ शुरू हो गईं थीं। बच्चे पूरा वर्ष इन छुट्टियों के सपने
संजोए रहते हैं। संजीव को भी नानी के पास जाना था। संजीव को मामा ननिहाल ने
आए। २-३ दिन वो चुप-चुप सा रहा। परन्तु धीरे-धीरे वो घर में व आस-पड़ोस के
बच्चों के साथ घुल-मिल गया था। उसने विपुल को अपना दोस्त बना लिया था।
विपुल संजीव को शाम ढले ही अपने खेतों की तरफ ले जाता। उसे ट्यूबवैल के
पानी से नहलाता। दोनों दूर-दूर तक दौड़ते,
खेलते,
कभी खेतों से मक्की तोड़ते,
तो कभी खीरे। झबुआ जो खेतों में ही रहता था,
उन्हें मक्की भून कर खिलाता। लस्सी का गिलास देना तो कभी न भूलता। घर आकर
भी रात ८-९ बजे तक संजीव गली में अपने दोस्त के साथ घूमता। घर में नानी उसे
रात को कहानी सुनाकर सुलाना कभी न भूलती। पूरा दिन घर में रौनक सी रहती।
मामा के बच्चों की भी छुट्टियाँ थी। मामी तरह-तरह के व्यंजन बनाकर बच्चों
को खिलाती। दिन बीतते गये। संजीव को इतवार को जाना था परन्तु ये क्या
शुक्रवार को ही उसके पिता ने ड्राइवर को गाड़ी देकर भेज दिया संजीव को लिवा
लाने के लिये। संजीव का मन घर जाने को न था वो भागा-भागा विपुल के पास उसे
अलविदा कहने गया परन्तु रो पड़ा। विपुल ने कहा,
“तुम्हें
तो खुश होना चाहिए तुम अपने माता-पिता के पास जा रहे हो।“
संजीव ने कहा,
“विपुल
तुम्हें पता है मुझे पहली बार लगा कि बच्चे क्या-क्या करते हैं?
मैं तो सुबह उठता हूँ,
आया मुझे तैयार करती है,
टिफिन देती है और ड्राइवर भैया स्कूल छोड़ आते हैं। स्कूल से वापस आकर टेबल
पर पड़ा खाना अकेला खाता हूँ और फिर सो जाता हूँ। ४ बजे उठकर टी॰वी॰ देखता
हूँ।“
“तुम्हारा
कोई दोस्त नहीं,
खेलने नहीं जाते?”
विपुल ने पूछा।
संजीव बोला,
“दोस्त
तो हैं पर जाऊँ कैसे,
बाहर से ड्राइवर भैय्या दरवाजे पर ताला लगा जाते हैं।
शाम को ६ बजे मम्मी-पापा आते हैं और घर खोलते हैं। मुझसे कोई बात भी नहीं
करता। उनके साथ ही ट्यूशन वाले सर आ जाते हैं,
८:३० पर वो जाते हैं और मैं सो जाता हूँ।“
ये कहकर संजीव रो पड़ा,
कहने लगा,
“विपुल,
ये छुट्टियाँ अब कब आएँगी?” |
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