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05.03.2012
 
छटपटाहट
शबनम शर्मा

बच्चों का ड्राईंग का पीरियड था। आज मैंने कक्षा में उनसे ही कुछ सुनने की ठानी। कक्षा 2 के नन्हें विद्यार्थी, एकदम आईने की तरह साफ स्पष्ट। मैंने सवाल रखा। आज आप बताएँगे कि आपको क्या अच्छा नहीं लगता। किसी ने कहा पढ़ना, किसी ने कहा घिया की सब्जी तो किसी ने कहा सुबह स्कूल आना। नन्हा मनोज अपनी कुर्सी से उठकर मेरे पास आया और बोला, "मैम! मुझे पता क्या अच्छा नहीं लगता।" मैंने उसका गाल थपथपाते हुए पूछा, "हाँ, बोलो।" वह फफक-फफक कर रो पड़ा व बोला, "मेरी मम्मी ने मुझे बुआ के घर पढ़ने को रखा है और खुद 2-2 महीने नहीं आती। मुझे उनकी बहुत याद आती है। जब बुआ अपने बच्चों को अपने साथ सुलाती है, बाज़ार ले जाती है और फूफा जी उन्हें खिलौने दिलाते हैं, चूमते हैं और मुझे पढ़ने बिठा देते हैं। जब उनका बेटा कभी मेरी चीज़ें माँगता है तो छीनकर दे देते हैं।"

नन्हें से बालक के मुँह से उसकी व्यथा सुनकर मैं स्तब्ध रह गई कि कौन सी पढ़ाई कराने के लिए जीते जी ममता इतनी हलकी हो गई।


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