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ISSN 2292-9754

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12.18.2014


चयन

चिलचिलाती गरमी और ऊपर से बिजली भी नहीं। परेशान सी मैं घर के गलियारे में बैठ गई। कभी-कभी हवा का झोंका मेरी शिकायत दूर कर रहा था कि सामने गली में 2 छोटे-छोटे बच्चे कंधे पर प्लास्टिक का थैला लटकाए कबाड़ी की आवाज़ देते आते दिखाई दिए।

काफ़ी रद्दी जमा थी सोचा दे दी जाए। मैंने उन्हें आवाज़ देकर बुलाया, भाव पूछा व रद्दी निकालकर रख दी। उस 7-8 साल के बच्चे ने अपने थैले से तराजु निकाली व पूरी कोशिश उसे सँभालने की करता हुआ रद्दी तोलने लगा। उसके हाथ बीच-बीच में डगमगाने लगे, वह फिर भी अपने को सँभालता हुआ रद्दी तोलता रहा। मुझे उसके इस रुले हुए बचपन पर बहुत तरस आया। मैंने कहा, "बच्चे तुम स्कूल क्यों नहीं जाते, ऐसे काम से क्या बन पाओगे अपनी ज़िन्दगी में।" उसने तराजु ज़मीन पर रखी और बड़े आत्मविश्वास से बोला, "बीबीजी, जो बच्चे स्कूलों में जाते हैं वो बीस बरस तक तो सोच भी नहीं सकते कि वो बड़े होकर क्या करेंगे? मेरा बापू कहता है, तू एक बड़ा कबाड़ी बनेगा, बीबीजी मैं एक बड़ा कबाड़ी बनूँगा।" उसका आत्मविश्वास देखकर मैं परेशान थी।


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