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ISSN 2292-9754

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12.18.2014


बुआ

नीरज मेरी सहपाठिन है, पिछले महीने दो बच्चों को लेकर वो मेरी कक्षा में आई। मुझे उसे पहचानने में कुछ समय लगा। पर मैंने पहचान लिया। मैंने उसे कुर्सी दी, हाल-चाल पूछा। उसे देखकर लग रहा था उसका पति नहीं है चेहरा बेरौनक, उदास। मैंने आखिर हिम्मत जुटाकर उससे पूछ ही लिया, कि उसने इतनी देर से विवाह क्यूँ किया कि बच्चे अभी कक्षा 2-3 में ही हैं।

वो बेमना सा हँस दी। फिर बोली, "किसकी शादी, किसके बच्चे। तुझे तो याद ही है माँ तीर्थ पर गई थी तब मर गई, पिताजी भी ये सब सहन न कर पाये, बिस्तर पकड़ लिया। मैं बड़ी थी, उनकी सेवा करती रही, फिर पिताजी चल बसे। भाभी अमीर घर की लड़की है कभी काम न करती। छोटी बहनों व भाई के लिये खाना बनाना, स्कूल भेजना, घर समेटना, माँ वाली सारी ड्यूटी मेरे सिर पर आ गई। बहनों की शादी जैसे-तैसे कर दी। वक्त का पहिया मुझे इस मोड़ पर ले आया कि इस घर ने मुझे जकड़े रखा और शादी की उम्र निकल गई। भाभी ने कभी चाहा भी नहीं और कोशिश भी नहीं की कि मेरी शादी हो। इसे देख, दुनिया भर का शरारती है मेरे गले में डाल दिया, लड़की को भी परसों इस स्कूल में दाखिल कराकर, मुझे एक कमरा, रसोई किराये पर दिलाकर, इनकी पढ़ाई व ज़िन्दगी का वास्ता देकर खुद उस हवेली में चले गये। पहले बहन-भाईयों का किया अब इनका करना पल्ले पड़ गया, क्या करूँ किस्मत है।"

ये कहकर वो फूट-फूटकर रोने लगी।


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