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ISSN 2292-9754

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02.06.2017


बंधन

हम कब, कैसे बँध
जाते हैं
रिश्तों की डोर में
पता ही नहीं चलता,
रिश्ते नहीं टूटते,
हम हो जाते ज़ार-ज़ार,
टुकड़े-टुकड़े,
बस दिखता है हमें
सिर्फ वो लम्हा, जब
पहली बार बँधे थे हम
उस डोर से,
डोर, कब कच्ची हुई,
कब धागे अलग-अलग हो गये,
खिसक गई हमारे
पाँव के नीचे की ज़मीन,
चूर-चूर हो गया हमारा
अस्तित्व और मिल गये
हम मिट्टी में।


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