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ISSN 2292-9754

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12.18.2014


बहू

आज चार बरस से बिस्तर पर पड़ी वो बुढ़िया कराह रही थी। पहले घर पर थी परन्तु आज हस्पताल के बिस्तर पर अपनी आखिरी साँसें गिन रही थी। बेटा शुरू से ही अपनी माँ से काफ़ी हद तक जुड़ा हुआ था। माँ ने कड़ी परिस्थितियों में रहकर अपने बेटे को पढ़ाया-लिखाया व क्लास-1 अफ़सर बनाया था। माँ की पेंशन आती थी, उसी से उसका इलाज चल रहा था। अन्दर माँ की आँखें बंद थी पर लब कभी-कभी कुछ बुदबुदा जाते थे वो कभी-कभी अपने बेटे का नाम पुकारती थी। उसकी पीठ में चोट लगी थी वह उठ न पाई थी। अन्दर कमरे में पड़ी वह बुढ़िया सबकी नज़रों में थी, पाँव में चार ईंटों का भार बंधा था, कभी जाने-अनजाने में पाँव हिल जाता तो मारे दर्द के वह कराह उठती। आज तो बहू-बेटा दोनों ही बरामदे में कुछ सलाह मशिवरा कर रहे थे। बेटा माँ की इस स्थिति से काफ़ी परेशान था। दो-चार बार पति को सांत्वना देकर बहू ने कहा, "देखो जी, अब बहुत हो लिया, माँ जी ने उमर भी काफ़ी भोग ली, ये कष्ट अब उन्हें नहीं, हम सबको है मेरी मानों आप डाक्टर से कहकर कोई ऐसा इंजैक्शन लगवा दो कि इन्हें इस कष्ट से छुट्टी मिले।"

इतना कहना था कि बेटे ने अपनी माँ के कंधे पर हाथ रखा, दबाया और अन्दर दादी के पास चला गया।


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